• इन होठों को परदे में छुपा लिया कीजिये;<br/>
हम गुस्ताख़ लोग हैं, आँखों से चूम लिया करते हैं!Upload to Facebook
    इन होठों को परदे में छुपा लिया कीजिये;
    हम गुस्ताख़ लोग हैं, आँखों से चूम लिया करते हैं!
  • बाग़ में ले के जन्म हम ने असीरी झेली;<br/>
हम से अच्छे रहे जंगल में जो आज़ाद रहे!
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    बाग़ में ले के जन्म हम ने असीरी झेली;
    हम से अच्छे रहे जंगल में जो आज़ाद रहे!
    ~ Brij Narayan Chakbast
  • तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ सकते हैं;<br/> 
ज़ुजाज की ये इमारत है संग-ए-ख़ारा नहीं!<br/> <br/>  
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    तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ सकते हैं;
    ज़ुजाज की ये इमारत है संग-ए-ख़ारा नहीं!

    ~ Allama Iqbal
  • तेरी किताब के हर्फ़े:

    तेरी किताब के हर्फ़े समझ नहीं आते,
    ऐ ज़िन्दगी तेरे फ़लसफ़े समझ नहीं आते;

    कितने पन्नें हैं, किसको संभाल कर रखूँ,
    और कौन से फाड़ दूँ सफे, समझ नहीं आते;

    चौंकाया है ज़िन्दगी यूँ हर मोड़ पर तुमने,
    बाक़ी कितने हैं शगूफे समझ नहीं आते;

    हम तो ग़म में भी ठहाके लगाया करते थे;
    अब आलम ये है कि लतीफे समझ नहीं आते;

    तेरा शुकराना जो हर नेमत से नवाज़ा मुझको,
    पर जाने क्यों अब तेरे तोहफ़े समझ नहीं आते!
  • अब मैं समझा तेरे रुख़सार पे तिल का मतलब;<br/>
दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रखा है!Upload to Facebook
    अब मैं समझा तेरे रुख़सार पे तिल का मतलब;
    दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रखा है!
    ~ Qamar Moradabadi
  • ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं;<br/>
तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं! Upload to Facebook
    ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं;
    तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं!
    ~ Allama Iqbal
  • मुझे बख्शी ख़ुदा ने कौन रोकेगा ज़ुबाँ मेरी;<br/>
तुम्हें हर हाल में सुननी पड़ेगी दास्तां मेरी! Upload to Facebook
    मुझे बख्शी ख़ुदा ने कौन रोकेगा ज़ुबाँ मेरी;
    तुम्हें हर हाल में सुननी पड़ेगी दास्तां मेरी!
    ~ Shamsi Meenai
  • मेरी फितरत को क्या समझेंगे ये ख्वाब-ए-गर्दाँ वाले;<br/>
सवेरे के सितारे की चमक है राज़दाँ मेरी!Upload to Facebook
    मेरी फितरत को क्या समझेंगे ये ख्वाब-ए-गर्दाँ वाले;
    सवेरे के सितारे की चमक है राज़दाँ मेरी!
    ~ Shamsi Meenai
  • ग़म दिये हैं हयात ने हम को;<br/>
ग़म ने हम से हयात पायी है! Upload to Facebook
    ग़म दिये हैं हयात ने हम को;
    ग़म ने हम से हयात पायी है!
  • वो बे-दर्दी से सर काटें और मैं कहूं उनसे;<br/>
हज़ूृर आहिस्ता-आहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता!
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    वो बे-दर्दी से सर काटें और मैं कहूं उनसे;
    हज़ूृर आहिस्ता-आहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता!
    ~ Ameer Minai