• इल्म-ओ-अदब के सारे खज़ाने गुज़र गए,<br/>
क्या खूब थे वो लोग पुराने गुज़र गए;<br/>
बाकी है जमीं पे फ़कत आदमी की भीड़,<br/>
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुज़र गए।
    इल्म-ओ-अदब के सारे खज़ाने गुज़र गए,
    क्या खूब थे वो लोग पुराने गुज़र गए;
    बाकी है जमीं पे फ़कत आदमी की भीड़,
    इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुज़र गए।
  • ठिकाना कब्र है तेरा, इबादत कुछ तो कर ग़ाफिल;<BR/>
कहावत है कि खाली हाथ किसी के घर जाया नहीं करते।
    ठिकाना कब्र है तेरा, इबादत कुछ तो कर ग़ाफिल;
    कहावत है कि खाली हाथ किसी के घर जाया नहीं करते।
  • कुछ खटकता तो है पहलू में मिरे रह रह कर;<br/>
अब ख़ुदा जाने तिरी याद है या दिल मेरा।
    कुछ खटकता तो है पहलू में मिरे रह रह कर;
    अब ख़ुदा जाने तिरी याद है या दिल मेरा।
    ~ Jigar Moradabadi
  • सौ बार मरना चाहा निगाहों में डूब कर 'फ़राज़';<br/>
वो निगाह झुका लेते हैं हमें मरने नहीं देते।
    सौ बार मरना चाहा निगाहों में डूब कर 'फ़राज़';
    वो निगाह झुका लेते हैं हमें मरने नहीं देते।
    ~ Ahmad Faraz
  • खींचो न कमानों को न तलवार निकालो;<br/>
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो।
    खींचो न कमानों को न तलवार निकालो;
    जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो।
    ~ Akbar Allahabadi
  • न माँझी, न रहबर, न हक में हवायें;<br/>
है कश्ती भी जर्जर, ये कैसा सफर है;<br/>
अलग ही मजा है, फ़कीरी का अपना;<br/>
न पाने की चिन्ता न खोने का डर है।
    न माँझी, न रहबर, न हक में हवायें;
    है कश्ती भी जर्जर, ये कैसा सफर है;
    अलग ही मजा है, फ़कीरी का अपना;
    न पाने की चिन्ता न खोने का डर है।
  • कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया;<br/>
जिस को ख़ाना-ख़राब होना था।<br/><br/>


कूचा-ए-इश्क़  =  प्यार की गली<br/>
ख़ाना-ख़राब  =  बर्बाद
    कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया;
    जिस को ख़ाना-ख़राब होना था।

    कूचा-ए-इश्क़ = प्यार की गली
    ख़ाना-ख़राब = बर्बाद
    ~ Jigar Moradabadi
  • तुझ को खबर नहीं मगर इक सादा-लौह को;<br/>
बर्बाद कर दिया तेरे दो दिन के प्यार ने।
    तुझ को खबर नहीं मगर इक सादा-लौह को;
    बर्बाद कर दिया तेरे दो दिन के प्यार ने।
    ~ Sahir Ludhianvi
  • तू साहिल है मेरा और जिन्दगी कश्ती है,
    तेरी आँखों में देख के खुशी हँसती है;

    ना जा हो कर नाराज़ कहीं दूर मुझसे,
    तेरे दिल में ही साँसें मेरी बसती हैं;

    देता नहीं दीदार कभी क्यों मुझ को तू,
    प्यास-ए-दीदार में आँखें तरसती हैं;

    देखता हूँ बैठे दो पक्षियों को साथ,
    तेरी याद में तब आँखें बरसती हैं;

    बड़ा गुमान है क्यों तुझको खुद पे,
    क्या है पहचान तेरी क्या तेरी हस्ती है;

    आज जाना है दिल के टूटने पे हमने,
    मोहब्बत की नहीं दिलजलों की बस्ती है!
  • चंद कलियाँ नशात की चुन कर मुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँ;<br/>
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ।<br/><br/>
नशात  =  ख़ुशी<br/>  
महव-ए-यास  =  दुःख में खोना
    चंद कलियाँ नशात की चुन कर मुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँ;
    तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ।

    नशात = ख़ुशी
    महव-ए-यास = दुःख में खोना
    ~ Sahir Ludhianvi