• ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं;<br/>
तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं!
    ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं;
    तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं!
    ~ Allama Iqbal
  • मुझे बख्शी ख़ुदा ने कौन रोकेगा ज़ुबाँ मेरी;<br/>
तुम्हें हर हाल में सुननी पड़ेगी दास्तां मेरी!
    मुझे बख्शी ख़ुदा ने कौन रोकेगा ज़ुबाँ मेरी;
    तुम्हें हर हाल में सुननी पड़ेगी दास्तां मेरी!
    ~ Shamsi Meenai
  • मेरी फितरत को क्या समझेंगे ये ख्वाब-ए-गर्दाँ वाले;<br/>
सवेरे के सितारे की चमक है राज़दाँ मेरी!
    मेरी फितरत को क्या समझेंगे ये ख्वाब-ए-गर्दाँ वाले;
    सवेरे के सितारे की चमक है राज़दाँ मेरी!
    ~ Shamsi Meenai
  • ग़म दिये हैं हयात ने हम को;<br/>
ग़म ने हम से हयात पायी है!
    ग़म दिये हैं हयात ने हम को;
    ग़म ने हम से हयात पायी है!
  • वो बे-दर्दी से सर काटें और मैं कहूं उनसे;<br/>
हज़ूृर आहिस्ता-आहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता!
    वो बे-दर्दी से सर काटें और मैं कहूं उनसे;
    हज़ूृर आहिस्ता-आहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता!
    ~ Ameer Minai
  • मेरी आंखों में आँसू हैं ना होठों पे तबस्सुम है;<br/>
समझ में क्या किसी की आयेगी तर्ज़-ए-फुगां मेरी!
    मेरी आंखों में आँसू हैं ना होठों पे तबस्सुम है;
    समझ में क्या किसी की आयेगी तर्ज़-ए-फुगां मेरी!
    ~ Shamsi Meenai
  • अब भी लोगों के दिल में ख़र की सूरत खटकता हूँ;<br/>
अभी तक याद है अहल-ए-चमन को दास्तां मेरी!
    अब भी लोगों के दिल में ख़र की सूरत खटकता हूँ;
    अभी तक याद है अहल-ए-चमन को दास्तां मेरी!
    ~ Shamsi Meenai
  • राहत-ए-जाँ से तो:

    राहत-ए-जाँ से तो ये दिल का बवाल अच्छा है,
    उसने पूछा तो है इतना तेरा हाल अच्छा है;

    माह अच्छा है बहुत ही न ये साल अच्छा है,
    फिर भी हर एक से कहता हूँ कि हाल अच्छा है;

    तेरे आने से कोई होश रहे या न रहे,
    अब तलक तो तेरे बीमार का हाल अच्छा है;

    आओ फिर दिल के समंदर की तरफ़ लौट चलें;
    वही पानी, वही मछली, वही जाल अच्छा है;

    कोई दीनार न दिरहम न रियाल अच्छा है,
    जो ज़रूरत में हो मौजूद वो माल अच्छा है;

    क्यों परखते हो सवालों से जवाबों को,
    होंठ अच्छे हों तो समझो कि सवाल अच्छा है!
  • लुत्फ़-ए-कलाम क्या जो न हो दिल में दर्द-ए-इश्क;<br/>
बिस्मिल नहीं है तू तो तड़पना भी छोड़ दे!
    लुत्फ़-ए-कलाम क्या जो न हो दिल में दर्द-ए-इश्क;
    बिस्मिल नहीं है तू तो तड़पना भी छोड़ दे!
  • है आशिक़ी में रस्म, अलग सब से बैठना;<br/>
बुत ख़ाना भी, हरम भी, कलीसा भी छोड़ दे!
    है आशिक़ी में रस्म, अलग सब से बैठना;
    बुत ख़ाना भी, हरम भी, कलीसा भी छोड़ दे!
    ~ Allama Iqbal