• तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,<br />
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।<br />
~ कबीर दास<br /><br />

अर्थ:<br />
कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पाँवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है।<br />
भगत कबीर जयंती की बधाई!
    तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
    कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
    ~ कबीर दास

    अर्थ:
    कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पाँवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है।
    भगत कबीर जयंती की बधाई!
  • बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,<br />
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।<br />
~ कबीर दास<br /><br />

अर्थ:<br />
यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।<br />
भगत कबीर जयंती की बधाई!
    बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
    हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
    ~ कबीर दास

    अर्थ:
    यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।
    भगत कबीर जयंती की बधाई!
  • माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,<br/>
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।<br/><br/>

अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।<br/>
शुभ कबीर जयंती!
    माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
    कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

    अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।
    शुभ कबीर जयंती!
  • पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय;<br/>
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय!<br/><br/>

अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।<br/>
शुभ कबीर जयंती!
    पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय;
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय!

    अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।
    शुभ कबीर जयंती!
  • बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,<br/>
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।<br/><br/>
अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।<br/>
कबीर दास जयंती की शुभ कामनायेँ!
    बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
    जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

    अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।
    कबीर दास जयंती की शुभ कामनायेँ!
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