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  • शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई:

    शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई,
    दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई;

    बज़्म-ए-ख़याल में तेरे हुस्न की शमा जल गई,
    दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई;

    जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी,
    जब तेरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई;

    दिल से तो हर मुआमला कर के चले थे साफ़ हम,
    कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई;

    आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र 'फ़ैज़' न जाने क्या हुए,
    रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई!
  • दो अंगुल की है सड़क,
    उस पर रेल चले बेधड़क,
    लोगों के हैं काम आती,
    समय पड़े तो खाक बनाती।
    माचिस!
  • हमारे जीवन में चाहे कितने भी अन्धकार पल क्यों न आये, बस वो थोड़े दिन ही रुककर चले जायंगे| फिर तो आशा की किरण चमकने ही लगेगी| ~ Orison Swett Marden
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