• अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें; <br/>
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!
    अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें;
    जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!
    ~ Ahmad Faraz
  • रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ;<br/>
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ!
    रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ;
    आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ!
    ~ Ahmad Faraz
  • बहुत मुश्किल से सुलाया था खुद को `फ़राज़` मैंने आज;<br/>
अपनी आँखों को तेरे ख्वाब का लालच दे कर!
    बहुत मुश्किल से सुलाया था खुद को `फ़राज़` मैंने आज;
    अपनी आँखों को तेरे ख्वाब का लालच दे कर!
    ~ Ahmad Faraz
  • कुछ तो मेरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख;<br/>
तू भी तो कभौ मुझको मनाने के लिये आ!<br/><br/>

पिंदार-ए-मोहब्बत : प्यार का अभिमान<br/>
भरम: भ्रम
    कुछ तो मेरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख;
    तू भी तो कभौ मुझको मनाने के लिये आ!

    पिंदार-ए-मोहब्बत : प्यार का अभिमान
    भरम: भ्रम
    ~ Ahmad Faraz
  • मुंतज़िर किसका हूँ टूटी हुयी दहलीज़ पर मैं;<br/>
कौन आयेगा यहाँ कौन है आनेवाला!<br/><br/>

मुंतज़िर: इंतज़ार<br/>
दहलीज़: दहरी
    मुंतज़िर किसका हूँ टूटी हुयी दहलीज़ पर मैं;
    कौन आयेगा यहाँ कौन है आनेवाला!

    मुंतज़िर: इंतज़ार
    दहलीज़: दहरी
    ~ Ahmad Faraz
  • इक उम्र से हूँ लज़्जत-ए-गिरिया से महरूम;<br/>
ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को मनाने के लिये आ!<br/><br/>
लज़्ज़त-ए-गिरिया: रोने के सुख<br/>
महरूम: वंचित<br/>
राहत-ए-जाँ: जो जान को सुख दे, प्रियेसी
    इक उम्र से हूँ लज़्जत-ए-गिरिया से महरूम;
    ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को मनाने के लिये आ!

    लज़्ज़त-ए-गिरिया: रोने के सुख
    महरूम: वंचित
    राहत-ए-जाँ: जो जान को सुख दे, प्रियेसी
    ~ Ahmad Faraz
  • हम भी मजबूरियों का उज़्र करें;<br/>
फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ!
    हम भी मजबूरियों का उज़्र करें;
    फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ!
    ~ Ahmad Faraz
  • सौ बार मरना चाहा निगाहों में डूब कर 'फ़राज़';<br/>
वो निगाह झुका लेते हैं हमें मरने नहीं देते।
    सौ बार मरना चाहा निगाहों में डूब कर 'फ़राज़';
    वो निगाह झुका लेते हैं हमें मरने नहीं देते।
    ~ Ahmad Faraz
  • ज़िन्दगी तो अपने क़दमों पे चलती है 'फ़राज़';<br/>
औरों के सहारे तो जनाज़े उठा करते हैं।
    ज़िन्दगी तो अपने क़दमों पे चलती है 'फ़राज़';
    औरों के सहारे तो जनाज़े उठा करते हैं।
    ~ Ahmad Faraz
  • दोस्ती अपनी भी असर रखती है फ़राज़;<br/>
बहुत याद आएँगे ज़रा भूल कर तो देखो।
    दोस्ती अपनी भी असर रखती है फ़राज़;
    बहुत याद आएँगे ज़रा भूल कर तो देखो।
    ~ Ahmad Faraz