• तेज़ है आज दर्द-ए-दिल साक़ी;</br>
तल्ख़ी-ए-मय को तेज़-तर कर दे!</br></br>

* तल्ख़ी-ए-मय:  bitterness of the wine
    तेज़ है आज दर्द-ए-दिल साक़ी;
    तल्ख़ी-ए-मय को तेज़-तर कर दे!

    * तल्ख़ी-ए-मय: bitterness of the wine
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • जब तुझे याद कर लिया सुबह महक महक उठी;</br>
जब तेरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गयी!
    जब तुझे याद कर लिया सुबह महक महक उठी;
    जब तेरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गयी!
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब;<br/>
आज तुम याद बे-हिसाब आए!
    कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब;
    आज तुम याद बे-हिसाब आए!
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के;<br/>

वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के!<br/><br/>

* शब-ए-ग़म -  ग़म/दुख की रात
    दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के;
    वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के!

    * शब-ए-ग़म - ग़म/दुख की रात
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • आए कुछ अब्र कुछ शराब आए;<br/>
इस के बा'द आए जो अज़ाब आए!<br/><br/>
*अब्र- मेघ, बादल
    आए कुछ अब्र कुछ शराब आए;
    इस के बा'द आए जो अज़ाब आए!

    *अब्र- मेघ, बादल
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई:

    शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई,
    दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई;

    बज़्म-ए-ख़याल में तेरे हुस्न की शमा जल गई,
    दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई;

    जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी,
    जब तेरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई;

    दिल से तो हर मुआमला कर के चले थे साफ़ हम,
    कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई;

    आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र 'फ़ैज़' न जाने क्या हुए,
    रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई!
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा; <br/>
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा! x
    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा;
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा! x
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है;<br/>
लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है!
    दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है;
    लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है!
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • तुझ पे उठ्ठी हैं वो खोई हुयी साहिर आँखें;<br/>
तुझ को मालूम है क्यों उम्र गवाँ दी हमने!
    तुझ पे उठ्ठी हैं वो खोई हुयी साहिर आँखें;
    तुझ को मालूम है क्यों उम्र गवाँ दी हमने!
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन;<br/>
देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के!
    इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन;
    देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के!
    ~ Faiz Ahmad Faiz