• दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था;</br>
इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था!
    दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था;
    इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था!
    ~ Qateel Shifai
  • उफ्फ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन;</br>
देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं!</br></br>
* शफ़्फ़ाफ़: निर्मल
    उफ्फ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन;
    देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं!

    * शफ़्फ़ाफ़: निर्मल
    ~ Qateel Shifai
  • हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ;<br/>
शीशे के महल बना रहा हूँ!
    हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ;
    शीशे के महल बना रहा हूँ!
    ~ Qateel Shifai
  • हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे;<br/>
अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ!
    हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे;
    अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ!
    ~ Qateel Shifai
  • क्या मस्लहत-शनास था वो आदमी 'क़तील'; <br/>
मजबूरियों का जिस ने वफ़ा नाम रख दिया!
    क्या मस्लहत-शनास था वो आदमी 'क़तील';
    मजबूरियों का जिस ने वफ़ा नाम रख दिया!
    ~ Qateel Shifai
  • आखिरी हिचकी तिरे ज़ानू पे आये;<br/>
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ!
    आखिरी हिचकी तिरे ज़ानू पे आये;
    मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ!
    ~ Qateel Shifai
  • सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको:

    सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको,
    जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको;

    सदियों का रत जगा मेरी रातों में आ गया,
    मैं एक हसीन शख्स की बातों में आ गया;

    जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए,
    देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए;

    गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर,
    उड़ जाए दुपट्टा तो खनक औढ लिया कर;

    तुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं,
    एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं;

    रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोके खाए है,
    अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए है!
    ~ Qateel Shifai
  • दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं;<br/>
लोग अब मुझ को तेरे नाम से पहचानते हैं।
    दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं;
    लोग अब मुझ को तेरे नाम से पहचानते हैं।
    ~ Qateel Shifai
  • मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ,<br/>
बरहना शहर में कोई नज़र ना आए मुझे।
    मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ,
    बरहना शहर में कोई नज़र ना आए मुझे।
    ~ Qateel Shifai
  • वफ़ा के शीश महल में सजा लिया मैनें;
    वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें;

    ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई;
    ग़मों कि ओट में ख़ुद को छुपा लिया मैनें;

    कभी न ख़त्म किया मैं ने रोशनी का मुहाज़;
    अगर चिराग़ बुझा, दिल जला लिया मैनें;

    कमाल ये है कि जो दुश्मन पे चलाना था;
    वो तीर अपने कलेजे पे खा लिया मैनें;

    "क़तील" जिसकी अदावत में एक प्यार भी था;
    उस आदमी को गले से लगा लिया मैनें।
    ~ Qateel Shifai