• हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है,<br />
दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है;<br />
करते हैं जिस पे तान कोई जुर्म तो नहीं,<br />
शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ उल्फ़त-ए-नाकाम ही तो है!<br /><br />
*इकराम: इनाम<br />
*दुश्नाम: अपशब्द
    हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है,
    दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है;
    करते हैं जिस पे तान कोई जुर्म तो नहीं,
    शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ उल्फ़त-ए-नाकाम ही तो है!

    *इकराम: इनाम
    *दुश्नाम: अपशब्द
    ~ Faiz Ahmad Faiz
  • कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे;<br />
हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे!
    कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे;
    हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे!
    ~ Hasan Naim
  • मिल रही हो बड़े तपाक के साथ;</br>
मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या!</br></br>
*तपाक: जोश</br>
*यकसर: बिलकुल
    मिल रही हो बड़े तपाक के साथ;
    मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या!

    *तपाक: जोश
    *यकसर: बिलकुल
    ~ Jaun Elia
  • न कर 'सौदा' तू शिकवा हम से दिल की बे-क़रारी का;</br>
मोहब्बत किस को देती है मियाँ आराम दुनिया में!
    न कर 'सौदा' तू शिकवा हम से दिल की बे-क़रारी का;
    मोहब्बत किस को देती है मियाँ आराम दुनिया में!
    ~ Sauda Mohammad Rafi
  • कुछ मोहब्बत को न था चैन से रखना मंज़ूर;</br>
और कुछ उन की इनायात ने जीने न दिया!
    कुछ मोहब्बत को न था चैन से रखना मंज़ूर;
    और कुछ उन की इनायात ने जीने न दिया!
    ~ Kaif Bhopali
  • एक बोसे के भी नसीब न हों;</br>
होंठ इतने भी अब ग़रीब न हों!</br></br>
*बोसे: चुम्बन
    एक बोसे के भी नसीब न हों;
    होंठ इतने भी अब ग़रीब न हों!

    *बोसे: चुम्बन
    ~ Farhat Ehsas
  • जब से तूने मुझे दीवाना बना रखा है,</br>
संग हर शख़्स ने हाथों में उठा रखा है;</br>
उस के दिल पर भी कड़ी इश्क़ में गुज़री होगी,</br>
नाम जिस ने भी मोहब्बत का सज़ा रखा है!
    जब से तूने मुझे दीवाना बना रखा है,
    संग हर शख़्स ने हाथों में उठा रखा है;
    उस के दिल पर भी कड़ी इश्क़ में गुज़री होगी,
    नाम जिस ने भी मोहब्बत का सज़ा रखा है!
    ~ Hakeem Nasir
  • हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल;</br>
ऐ ज़िंदगी वगरना ज़माने में क्या न था!</br></br>
*फ़क़त: केवल
    हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल;
    ऐ ज़िंदगी वगरना ज़माने में क्या न था!

    *फ़क़त: केवल
    ~ Azad Ansari
  • ग़ैरों से तो फ़ुर्सत तुम्हें दिन रात नहीं है;</br>
हाँ मेरे लिए वक़्त-ए-मुलाक़ात नहीं है!
    ग़ैरों से तो फ़ुर्सत तुम्हें दिन रात नहीं है;
    हाँ मेरे लिए वक़्त-ए-मुलाक़ात नहीं है!
    ~ Lala Madhav Ram Jauhar
  • ये अदा-ए-बे-नियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक;</br>
मगर ऐसी बे-रुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे!</br></br>
*अदा-ए-बे-नियाज़ी: लापरवाही की हवा
    ये अदा-ए-बे-नियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक;
    मगर ऐसी बे-रुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे!

    *अदा-ए-बे-नियाज़ी: लापरवाही की हवा
    ~ Shakeel Badayuni