• लंड पे निबन्ध:

    1. प्रस्तावना: लंड ये एक ऐसी चीज है जो धरती पर पाए जाने वाले प्रत्येक मर्द के पास पाया जाता है। इसका जन्म मानव शारीर के साथ ही हो जाता है। इसको शरीर का गन्दा तरल पदार्थ निकालने के लिए बनाया गया है लेकिन मानव ने इसके कई उपयोग किये हैं।

    2. प्रकार: लंड कई प्रकार के होते हैं पर चलन में मुख्य तरह के 4 लंड हैं:-
    i. टोपी वाला
    ii. चमड़ी वाला
    iii. टेड़ा
    iv. लटका हुआ
    यह दो साइजो में पाया जाता है, लम्बा एवम छोटा

    3. नाम: लंड को अलग - अलग जगह अलग - अलग नाम से पुकारा जाता है। कही लवड़ा, लौड़ा, मुन्नी,चुन्नू,घंटा, शिश्न,पेनिस,डंडा इत्यादि।

    4. प्रयोग: लंड के कई प्रयोग हैं। शुरुआत में यह शरीर के तरल अवयव बाहर निकलने के काम आता है। किशोर अवस्था आते आते इसके दुसरे प्रयोग समझ आते हैं।इसके अंदर कुछ हारमोन के कारण किशोरावस्था में हलचल चालू हो जाती है।बाद में युवा अवस्था में यह किसी भी महिला को देखकर व उनके उभार व गांड देखकर अपने आप हिलने लगता है। फिर यह खड़ा होने लगता है।

    5. किरयायें: लगभग 16 वर्ष आते - आते इसके आस पास घने बाल उग आते हैं। इसके बाद किशोरों को रात को कुछ सपने आते हैं अजीब से जिससे इसमे से कुछ चिकनाई युक्त पदार्थ निकलता है जो कि शुरू में किशोरों को डरा देता है। लेकिन कुछ समय बाद मजा आने पर किशोर अपने लंड की चमड़ी को आगे पीछे कर के माल(जिसे वीर्य कहा जाता है) निकालते हैं।वो फिर धीरे धीरे अपनी हम उम्र या बड़ी उम्र की महिलाओं के बारे सोच कर चमड़ी को आगे पीछे करते है। इस क्रिया को ह्स्त्मेथुन कहा जाता है। कुछ लोग इसे गणित की भाषा में 61-62 भी कहते हैं।

    6. नुकसान: ह्स्त्मेथुन क्रिया शरीर को काफी नुकसान पहुचाती है। इससे शारीर की नसें कमजोर पडती हैं। उंगलिया चटकनी पडती हैं। यदि लंड की बराबर सफाई न की जाए तो यह घातक हो जाता है। इसके आसपास काफी फोड़े फुंसी हो जाते है।

    7. चाहत: लंड की भी किसी इन्सान की तरह चाहत होती है। धीरे से घर वाले भी आपके लंड की चाहत को समझ कर इसके लिए एक गड्डे की व्यवस्था करने में लग जाते है। व्यवस्था होने के बाद शुरू होती है इसकी धमा - चौकड़ी। आपकी शादी होने से जितनी ख़ुशी आपको नही होती उससे ज्यादा खुश यह आपका लाडला होता है।फिर यह उस औरत के गड्डे में घुसता है। उसके मुह में घुसता है। गांड की और घुसने की कोशिश करता है और इस तरह से इसका नया उपयोग दिनो - दिन चालू हो जाता है।

    8. समापन: लंड यह प्रक्रति द्वारा बनाई गई एक ऐसी चीज है जिसके बिना दुनिया की कल्पना सम्भव नही है। भाइयो इसका खूब प्रयोग करो लेकिन अप्रकार्तिक मैथुन से बचते रहना नही तो इसकी उम्र कम हो जाती है। सही उपयोग जितना ज्यादा करोगे उतनी ही इसकी उम्र और आपकी तथा आपकी औरत की ख़ुशी बढेगी।

    आपके लंड को और शक्ति मिले इसी मंगलकामना के साथ आपके मित्र का प्रणाम।

    यह साहित्यिक क्रति कैसी लगी अपना मत दे हमारा हौसला बड़ेगा।
  • सेक्स वाला बंदर!

    एक औरत एक दुकान में एक बोर्ड पढती है जिस पर लिखा था - "सेक्स करने वाला बन्दर "

    औरत दुकानदार से कहती है उसे एक चाहिए और ५००० रूपये देकर बन्दर खरीद लेती है।

    दुकानदार उसे एक कागज़ देता है जिस पर इस्तेमाल का तरीका लिखा था।

    औरत घर जाती है और कागज़ को पढ़ती है जिसमें लिखा था " बन्दर को नहला कर और खुद नहा कर बिस्तर पर लेट जाएँ, बाकी काम बन्दर खुद कर लेगा।

    औरत बन्दर को नहला कर और खुद नहा कर बिस्तर पर लेट जाती है पर बन्दर कुछ भी नहीं करता।

    औरत बन्दर को एक बार और नहला कर खुद भी एक बार और नहाती है और बिस्तर पर लेट जाती है, पर बन्दर फिर भी कुछ नहीं करता।

    थक कर वो उस कागज को दोबारा पढ़ती है और वो उसमें नीचे लिखा देखती है - "परेशानी होने पर दुकानदार को फोन करें "।

    औरत दुकानदार को फोन मिलाती है - आपका बन्दर तो बिलकुल भी काम का नहीं है आप इसे आकर चेक करें ।

    दुकानदार थोड़ी देर में उस औरत के घर पर पहुँच जाता है और बन्दर को अपने सामने एक टेबल पर बैठा कर बोलता है -

    "ध्यान रख मैं तुझे आखिरी बार करके दिखा रहा हूँ।"

  • पुरुष का 'लिंग'!

    सबसे पवित्र चीज है पुरुष का 'लिंग'

    ये बहूत विनम्र है, हमेशा झुका रहता है

    ये दयालु है, लडकियों की गोद भरता है

    ये असली गुरु है, जो अपने दो चेलों का साथ नही छोडता

    इसमें सादगी है, ये छोटी सी गुफा में रात गुजारता है

    ये आदरणीय है, नारी को देख के खड़ा हो जाता है

    ये कोमल है, चाहे कितना भी मोड़ो मरोड़ो इसमें से अमृत ही निकलता है, जिससे सृष्टि चलती है।

    अगर आप भी लिंग धारी हैं तो इसे आगे भेजते रहिये।
  • कवियित्री की सुहागरात!

    उस रात की बात न पूछ सखी जब साजन ने खोली अँगिया

    स्नानगृह में नहाने को जैसे ही मैं निर्वस्त्र हुई,

    मेरे कानों को लगा सखी, दरवाज़े पर है खड़ा कोई,

    धक्-धक् करते दिल से मैंने, दरवाज़ा सखी री खोल दिया,

    आते ही साजन ने मुझको, अपनी बाँहों में कैद किया,

    मेरे यौवन की पा के झलक, जोश का यूँ संचार हुआ,

    जैसे कोई कामातुर योद्धा रण गमन हेतु तैयार हुआ,

    मदिरापान प्रारंभ किया, मेरे होठों के प्याले से,

    जैसे कोई पीने वाला, बरसों दूर रहा मधुशाले से,

    होठों को होठों में लेकर, उरोजों को हाथों से मसल दिया,

    फिर साजन ने सुन री ओ सखी,जल का फव्वारा खोल दिया,

    भीगे यौवन के अंग-अंग को, काम-तुला में तौल दिया,

    कंधे, स्तन, नितम्ब, कमर कई तरह से पकड़े-छोड़े गए,

    गीले स्तन सख्त हाथों से,वस्त्रों की तरह निचोड़े गए,

    जल से भीगे नितम्बों को, दांतों से काट-कचोट लिया,

    जल क्रीड़ा से बहकी थी मैं, चुम्बनों से मैं थी दहक गई,

    मैं विस्मित सी सुन री ओ सखी, साजन की बाँहों में सिमट गई,

    वक्षों से वक्ष थे मिले हुए, साँसों से साँसें मिलती थी,

    परवाने की आगोश में आ, शमाँ जिस तरह पिघलती थी,

    साजन ने फिर नख से शिख तक, होंठों से अतिशय प्यार किया,

    मैंने बरबस ही झुककर के, साजन का अंग दुलार दिया,

    चूमत-झूमत, काटत-चाटत, साजन पंजे पर बैठ गए,

    मैं खड़ी रही साजन के लब, नाभि के नीचे पैठ गऐ,

    मेरे गीले से उस अंग से, उसने जी भर रसपान किया,

    मैंने कन्धों पर पाँवों को, रख रस के द्वार को खोल दिया,

    मैं मस्ती में थी डूब गई, क्या करती थी ना होश रहा,

    साजन के होठों पर अंग रख, नितम्बों को चहुँ ओर हिलोर दिया,

    साजन बहके-दहके-चहके, मोहे जंघा पर ही बिठाय लिया,

    मैंने भी उनकी कमर को, अपनी जंघाओं में फँसाय लिया,

    जल से भीगे और रस में तर अंगों ने, मंजिल खुद खोजी,

    उनके अंग ने मेरे अंग के, अंतिम पड़ाव तक वार किया,

    ऊपर से थे जल कण गिरते, नीचे दो तन दहक-दहक जाते,

    यौवन के सुरभित सौरभ से, अन्तर्मन महक -महक जाते,

    एक दंड से चार नितम्ब जुड़े, एक दूजे में धँस-धँस जाते,

    मेरे कोमल, नाजुक तन को, बाँहों में भर -भर लेता था,

    नितम्ब को हाथों से पकड़े वो, स्पंदन को गति देता था,

    मैंने भी हर स्पंदन पर था, दुगना जोर लगाय दिया

    मेरे अंग ने उनके अंग के, हर एक हिस्से को फँसाय लिया,

    ज्यों वृक्ष से लता लिपटती है, मैं साजन से लिपटी थी यों,

    साजन ने गहन दबाव दे, अपने अंग से चिपकाय लिया,

    अब तो बस एक ही चाहत थी, साजन मुझमें ही खो जाएँ,

    मेरे यौवन को बाँहों में, भरकर जीवन भर सो जाऐं,

    होंठों में होंठ, सीने में वक्ष, आवागमन अंगों ने खूब किया,

    सब कहते हैं शीतल जल से, सारी गर्मी मिट जाती है,

    लेकिन इस जल ने तन पर गिर,मन की गर्मी को बढ़ाए दिया,

    वो कंधे पीछे ले गया सखी, सारा तन बाँहों में उठा लिया,

    मैंने उसकी देखा-देखी, अपना तन पीछे हटा लिया,

    इससे साजन को छूट मिली, नितम्ब को ऊपर उठा लिया,

    अंग में उलझे मेरे अंग ने, चुम्बक का जैसे काम किया,

    हाथों से ऊपर उठे बदन, नितम्बों से जा टकराते थे,

    जल में भीगे उत्तेजक क्षण, मृदंग की ध्वनि बजाते थे,

    खोदत-खोदत कामांगन को, जल के सोते फूटे री सखी,

    उसके अंग के फव्वारे ने, मोहे अन्तःस्थल तक सींच दिया,

    मैंने भी मस्ती में भरकर, उनको बाँहों में भींच लिया,

    साजन के जोश भरे अंग ने, मेरे अंग में मस्ती को घोल दिया,

    सदियों से प्यासे तन-मन को, प्यारा तोहफा अनमोल दिया,

    फव्वारों से निकले तरलों से, तन-मन थे दोनों तृप्त हुए,

    साजन के प्यार के मादक क्षण, मेरे अंग-अंग में अभिव्यक्त हुए,

    मैंने तृप्ति के चुंबन से फिर, साजन का सत्कार किया,

    दोनों ने मिल संभोग समाधि का, यह बहता दरिया पार किया,

    उस रात की बात न पूछ सखी, जब साजन ने खोली अँगिया।
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